
गांव के सैकड़ों महिलाएं आज भी सरकारी मदद की आस में
देवभोग:- गरियाबंद में किडनी पीड़ितों के गांव कहे जाने वाले सुपेबेड़ा के दर्द से अब कोई अनजान नहीं है,और इस दर्द का किसी भी सरकार के पास अब तक इलाज नहीं हैं। पिछले 19 सालों में यहां 150 से ज्यादा किडनी रोगियों की मौत हो चुकी हैं,जबकि 2 दर्जन अधिक लोग अब भी इस बीमारी से ग्रसित हैं,राहत और बचाव के सरकारी दावे के बीच विधवा हो चुकी महिलाएं जो अब बीमारी से नहीं,बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था से जूझ रही है।
राज्यपाल के निर्देश के बाद जिन दो महिलाओं को दी गई थी नौकरी अब उन्हें भी विभाग ने निकाला
सुपेबेडा ग्राम की रहने वाली वैदेही और लक्ष्मी सोनवानी के घर किडनी रोग काल बन कर आया, दोनों के पति शिक्षक थे,लेकिन 2014 में लक्ष्मी सोनवानी के पति क्षितीराम की किडनी रोग से मौत हो गई, जबकि 2017 में वैदेही क्षेत्रपाल के पति प्रदीप की मौत हो गई,बीमारी से ग्रसित पति के इलाज के लिए दोनों महिलाओं को जमीन से लेकर जेवर तक बेचना पड़ा, होम लोन लेकर इलाज भी कराया, लेकिन पैसे खर्च होने के बाद भी जान नहीं बच पाई। बता दें कि दोनों महिलाओं के 3-3 बच्चे हैं और इनकी गुजर बसर और परवरिश की जिम्मेदारी का बोझ अब इन दोनों महिलाओं पर है, वहीं साल 2019 में राज्यपाल अनुसुइया उईके के सुपेबेड़ा दौरे के बाद कलेक्टर दर पर प्रतिमाह 10 हजार की पगार पर दोनों महिलाओं को नौकरी मिल गई थी,लेकिन यह नौकरी का साथ सिर्फ कुछ साल तक ही मिला,अब ये दोनों महिलाएं को नौकरी से बाहर का रास्ता दिखाया जा चुका हैं, मिली जानकारी मुताबिक शासन के नए सेटअप के चलते देवभोग मनरेगा में कलेक्टर दर पर कार्यरत दो कर्मचारी को नौकरी से निकालने का फरमान जारी हुआ हैं,जिसके चलते इन दो महिलाओ को नौकरी से निकाल दिया गया हैं। पति के मृत्यु के बाद ये दोनों सालों से अनुकंपा नियुक्ति की आस लगाए हुए हैं जो सालों बीतने के बाद भी इनके बच्चों को नहीं मिल सका,जिसके चलते अब उन्हें परिवार की जिम्मेदारी उठाने में काफी दिक्कत हो रही, छग शासन द्वारा चलाए जा रहे सुशासन समाधान शिविर निष्ठीगुडा में ये पुनः नौकरी में वापस रखने के लिए आवेदन भी दिया हैं,बहरहाल अब देखना होगा कि इन्हें वापस नौकरी मिलेगी या आश्वासन का लॉलीपॉप थमा दिया जाएगा।

इस गांव की 80 से ज्यादा महिलाएं आज भी सरकारी मदद की आस में
इस गांव में लगाभग 80 महिलाएं ऐसी है जिनके पति और पिता की मौत किडनी रोग से हो गई,वहीं घर की मुखिया के गुजर जाने के बाद परिवार चलाने के लिए सरकारी मदद के लिए ये महिलाएं संघर्ष कर रही है,इन्हीं में से एक प्रेमशिला, इनके पति, सास और ससुर की मौत 7 साल पहले किडनी रोग से हो गई थी। वहीं पति और ससुर की मौत के बाद छोटी ननद और दो बच्चे के भरण पोषण की जिम्मेदारी अब प्रेमशिला के कंधे पर है,बता दें कि प्रेमशिला घर चलाने के लिए सिलाई करती है।

अधिकांश पीड़ित परिवार मजदूरी के भरोसे चला रही है घर परिवार,पर इस बार मजदूरी भी नहीं मिली
इसी गांव की गोमती बाई,रीना आडील,यशोदा और हेमबाई मजदूरी के भरोसे परिवार चला रही है,वहीं सरकार के निर्देश के बावजूद जिला पंचायत ने केवल महिला समूह का गठन कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया है,पिछले 6 साल में 6 सिलाई मशीन देकर सारे महिलाओं के दर्द निवारण का दावा करने वाले जिला पंचायत के अफसर कैमरे के सामने कुछ भी कहने से बचते नजर आ रहे हैं। इधर,स्वास्थ्य विभाग के अफसर अपनी जिम्मेदारी निभाने की बात कह रहे है। जबकि ग्रामीण विभाग के विपरीत बात कहते नजर आते हैं। मजदूरी के भरोसे जीवन यापन करने वाले परिवारों को इस साल भी मनरेगा जैसे रोजगार मूलक कार्य का आस था लेकिन इस रोजगार नहीं मिलने से गांव से कई परिवार पलायन कर चुके हैं,तो कई परिवारों के ऊपर परिवार के भरणपोषण का चिंता साफ देखा जा सकता हैं।
